उम्र भर तेरे साथ चलता रहा मैं
कुछ तू भी मेरे हिस्से का सफर कर ले
यूँही सहता रहा तेरे हिस्से का जब्र मै
कभी तू भी अपनी जिंदगी नजर कर ले
नफरत भी शिद्दत से तू कर ना पाया कभी
प्यार का एक लफ्ज हो सकें बोल ले
जिप्सी
उम्र भर तेरे साथ चलता रहा मैं
कुछ तू भी मेरे हिस्से का सफर कर ले
यूँही सहता रहा तेरे हिस्से का जब्र मै
कभी तू भी अपनी जिंदगी नजर कर ले
नफरत भी शिद्दत से तू कर ना पाया कभी
प्यार का एक लफ्ज हो सकें बोल ले
जिप्सी
जब जब गांव की मिटटी छु लेता है वो,
कुछ अजिबसे रोंगटे खड़ें हों जाते बदन पे.
मन निकल लेता है उन पुराने गलियारों की और
उसे नजर आता है बच्चा जो स्कुल की दीवारों कूद के घर भाग जाया करता था .
चौराहे की मिठाई की दुकान,
क्रिकेट के बॉल से फूटे हुए मकान,
अक्सर उसे बचपन की याद दिला देते है.
फिर वो पहुचता है इक मंदिर
जिसे लोग 'घर' पर वो
आज भी 'स्वर्ग' कहता है !!
आज भी 'स्वर्ग' कहता है !!!
जिप्सी
आतातरी तुझ्या मिठीत विरघळू दे,
गंध प्राजक्ताचा थोडा दरवळू दे
एव्हाना जगलो एकटाच
सुगंधी जखम थोड़ी भळभळु दे
आल्यासारखे रहा थोड़ी हृदयात
घरास थोड़े घरपण मिळू दे
बेरीज कर तुझ्या-माझ्या जीवनाची
आयुष्याचे गणित थोड़े तरी कळू दे
जिप्सी
बारिश की मेमरी भी बड़ी अजीब होती
पत्तो को हरा कर देती है, इंसान को सुखा ।
खैर वो छोड़ो
खिड़की से बाहर हाथ निकालकर देखा है कभी,
वोही बारिश अपने पन का भी एहसास देती है ।
तुम्हे याद है 'सखी' वो बारिश का दिन जब हम दोनों हाथ में सैंडल लिए,
नंगे पांव एक अजनबी रस्ते पे पागलो जैसे घूम रहे थे ।
उस दिन मिटटी की खुशबु भी अजीब ही थी, जैसे किसीने नए सेंट की बॉटल खोली हो ।
वैसे तो एक अर्सा गुजर गया है इस बात को पर आज भी वो दिन याद से गया नहीं ।
वो एक दिन था, और आज एक दिन है
उस वक़्त हम साथ होने के सपने बुनते थे,
आज सपने सच हो के साथ है ।
#Gypsy
#सखी
मज व्यथेची हाव कुठे,
कुंपणाची धाव कुठे
दुःख ही जरासे पचले नाही,
वेदनेला वाव कुठे
जिंकला समर जरी तो,
तरी सुखाची हाव कुठे
झाली माणसे परागंदा,
राहिले मज गाव कुठे
रेखले होते तुझे नाव ज्याच्यात,
हरवले ते डायरीचे पान कुठे
#जिप्सी
अताशा जन्म झाला माझा
आता कुठे मी जगण्यास लायक होतो
त्यांनी केले मला पुढारी गुलामांचा
मला वाटले मी नायक होतो
प्रश्न जेव्हा जगण्याचा येतो
माझा लढ़ा निर्णायक होतो
एवढे समर जिंकुनही
कृष्ण तरी कुठे राधेचा होतो
-जिप्सी
तसा हट्ट नाहिये माझा
अगदी तश्याच राहिल्या तरी चालतील
मरीन ड्राइव च्या आठवणी, तुझी झालेली पाठवणी
माळलेल्या मोगर्याचा सुगंध, पहिल्या पावसाचा मृद्गगंध
सोबतीने काढलेली कुडकुड़ती रात्र,
नकळत एकमेकात विरघळलेले अनिमिष नेत्र
अगदी अबोल शब्दांची पेरणी पण तशीच राहु दे
तसा हट्टच नाहिये माझा
फक्त
बघ जमलच तर कर मौनांची भाषांतरे
#जिप्सी