Friday, 4 September 2015
Tuesday, 18 August 2015
सालगिराह
जो तुझे अपना मान चुकेँ है.
जिनसे तू बातें करता है,
जिनके हर वक़्त तू साथ साथ चलता है.
कभी 'फुरसत के दिन ढूंढने' में,
तो कभी इस शहर में घूमते हुए
'आशियाना' ढूंढते हुए तू साथ है.
नैना ठग लेंगे ठग लेंगे'
कह के आगाह भी किया था,
फिर भी मैंने तेरी एक नहीं सुनी. !!!
कहके मुझे आवाज दी,
Thursday, 13 August 2015
छोड ना यार
मी म्हणतो , छोड़ दे गोली मार ना यार
तो म्हणतो, चल आपण बोलू तिच्या बापाशी पेटवू सारं रान
मी म्हणतो, छोड़ वो मेरे नसीब में ही नहीं थी कश मार ना यार
तो म्हणतो, चल उठ दाखवू जगाला लायकी आपली
मी म्हणतो, छोड़ दे चुपचाप पेग मार ना यार
तो म्हणतो , या साल्या भ्रष्टाचार्याना गोळ्याच घालायला पाहिजे
मी म्हणतो, कालच लाच दिली एकाला छोड़ हवा आने दे ना यार
जिप्सी
Saturday, 8 August 2015
दिवानगी
इस शहर से अब गुजर जाना चाहिए
रंग 'उदासी' का रंग ढूंढने जाना चाहिए
वक्त आ गया है की साहिल को छोड़ दे अब
समंदर तुझे भी शहर-ए-वफ़ा छोड़ना चाहिए
घर से निकलोगे तभी कारवाँ बनेगा
आखरी मंजिल तक जाना चाहिए
मुद्दते हो गई 'दिवानगी' किये हुए
कुछ ख्वाहिशो को भी पूरा होना चाहिए
जिप्सी
Wednesday, 5 August 2015
सफर
उम्र भर तेरे साथ चलता रहा मैं
कुछ तू भी मेरे हिस्से का सफर कर ले
यूँही सहता रहा तेरे हिस्से का जब्र मै
कभी तू भी अपनी जिंदगी नजर कर ले
नफरत भी शिद्दत से तू कर ना पाया कभी
प्यार का एक लफ्ज हो सकें बोल ले
जिप्सी
Sunday, 12 July 2015
घर
जब जब गांव की मिटटी छु लेता है वो,
कुछ अजिबसे रोंगटे खड़ें हों जाते बदन पे.
मन निकल लेता है उन पुराने गलियारों की और
उसे नजर आता है बच्चा जो स्कुल की दीवारों कूद के घर भाग जाया करता था .
चौराहे की मिठाई की दुकान,
क्रिकेट के बॉल से फूटे हुए मकान,
अक्सर उसे बचपन की याद दिला देते है.
फिर वो पहुचता है इक मंदिर
जिसे लोग 'घर' पर वो
आज भी 'स्वर्ग' कहता है !!
आज भी 'स्वर्ग' कहता है !!!
जिप्सी
Thursday, 9 July 2015
प्राजक्त
आतातरी तुझ्या मिठीत विरघळू दे,
गंध प्राजक्ताचा थोडा दरवळू दे
एव्हाना जगलो एकटाच
सुगंधी जखम थोड़ी भळभळु दे
आल्यासारखे रहा थोड़ी हृदयात
घरास थोड़े घरपण मिळू दे
बेरीज कर तुझ्या-माझ्या जीवनाची
आयुष्याचे गणित थोड़े तरी कळू दे
जिप्सी
